सूनी डगर


हमने जो राहें सजाई थीं,
वो उसके क़दमों की आस में थीं।
हर मोड़ पर हमने लिखा था नाम उसका,
हर छांव में थी तस्वीर उसकी।


पर वो तो किसी और की मंज़िल बन गई,
हमारी राह को वीरान कर गई।
हम यूँ ही चलते रहे,
उसी मोड़ तक जहाँ वो कभी मुस्कुराई थी।

वक़्त ने समझाया बहुत,
कि जो चला जाए, उसे लौटाना इरादा नहीं होता।
पर दिल है कि अब भी जिद पर है,
कि शायद वो राह कभी लौट आए।

हम अब भी चलते हैं —
ना मंज़िल है, ना हमसफ़र।
बस एक उम्मीद का टुकड़ा है साथ,
जो कहता है —
"शायद कोई मोड़ फिर उसका हो!


-पवन कुमार 

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