इंतज़ार और इरादा
हम बैठे रहे आस की चौखट पर,
हर शाम उसकी परछाईं को टटोलते,
हर सुबह उम्मीद में जागते,
कि आज शायद वो लौट आए।
हमने सर्द हवाओं को भी रोका,
धूप में उसकी यादें सेंकीं,
घड़ियों से कहा, धीरे चलो —
कहीं उसका पल छूट न जाए।
पर वो तो किसी और की बाँहों में
भविष्य की योजनाएँ लिख रही थी,
हमारी चुप्पियों को अनसुना कर
किसी और के नाम की मन्नत माँग रही थी।
हमने जहाँ कहानी सोची थी,
वो वहाँ नया अध्याय शुरू कर चुकी थी।
और हम?
हम अब भी वहीं हैं —
जहाँ इंतज़ार और प्यार दोनों अधूरे रह गए।
-पवन कुमार
Comments
Post a Comment