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सूनी डगर

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हमने जो राहें सजाई थीं, वो उसके क़दमों की आस में थीं। हर मोड़ पर हमने लिखा था नाम उसका, हर छांव में थी तस्वीर उसकी। पर वो तो किसी और की मंज़िल बन गई, हमारी राह को वीरान कर गई। हम यूँ ही चलते रहे, उसी मोड़ तक जहाँ वो कभी मुस्कुराई थी। वक़्त ने समझाया बहुत, कि जो चला जाए, उसे लौटाना इरादा नहीं होता। पर दिल है कि अब भी जिद पर है, कि शायद वो राह कभी लौट आए। हम अब भी चलते हैं — ना मंज़िल है, ना हमसफ़र। बस एक उम्मीद का टुकड़ा है साथ, जो कहता है — "शायद कोई मोड़ फिर उसका हो! -पवन कुमार 

इंतज़ार और इरादा

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हम बैठे रहे आस की चौखट पर, हर शाम उसकी परछाईं को टटोलते, हर सुबह उम्मीद में जागते, कि आज शायद वो लौट आए। हमने सर्द हवाओं को भी रोका, धूप में उसकी यादें सेंकीं, घड़ियों से कहा, धीरे चलो — कहीं उसका पल छूट न जाए। पर वो तो किसी और की बाँहों में भविष्य की योजनाएँ लिख रही थी, हमारी चुप्पियों को अनसुना कर किसी और के नाम की मन्नत माँग रही थी। हमने जहाँ कहानी सोची थी, वो वहाँ नया अध्याय शुरू कर चुकी थी। और हम? हम अब भी वहीं हैं — जहाँ इंतज़ार और प्यार दोनों अधूरे रह गए। -पवन कुमार 

खाली हाथ

"खाली हाथ" वो हर बार जब भी बुलाती, मैं बिना सोचे समझे चला जाता। वक़्त, नींद, काम, सब छोड़ आता, बस उसकी एक मुस्कान के लिए। वो कहती – "तुम तो हमेशा मिल जाते हो!" और मैं चुप रह जाता, क्योंकि कहना चाहता था – "कभी मुझे ना पाकर भी तो देखो..." धीरे-धीरे उसने आदत बना ली, और मैंने अपनी ज़रूरत समझ ली। वो आगे बढ़ती रही... मैं वहीं खड़ा रहा, खाली... बस उसके लिए। एक दिन उसने कहा – "अब मुझे अकेला रहने की आदत हो गई है..." और मैंने मुस्कुराकर कहा – "मैं तो शुरू से ही अकेला था, बस तुम दिखती थीं..." पवन

वो मुझसे बोर होने लगी!

वो मुझसे बोर होने लगी, अब बातों में पहले सा शौक नहीं। जो हर सुबह मेरी मुस्कान थी, अब उस मुस्कान में वो रोक नहीं। पहले जो हर बात पे हँसती थी, अब चुपचाप सी रहने लगी। जो आंखें मेरी तलाशा करती थीं, अब नजरें चुराने लगी। मैं वही था, पर शायद वक्त बदल गया, या फिर उसके दिल में कोई और बस गया। मेरी कोशिशें अब बोझ सी लगती थीं, जो साथ था, अब 'सोच' सी लगती थीं। मैं अब भी उसी जोश में जी रहा था, पर वो थकने लगी थी, थमने लगी थी। मैं हर रोज़ नया बनने की कोशिश में था, और वो हर रोज़ मुझसे बोर होने लगी थी.. 💞पवन कुमार 

ठाकुर की कृपा!

गावँ के गलियारे में, एक पिंड पड़ा था जर्जर, सालों से उस पर कुत्ता मूतता नहीं किसी को फिकर , एक दिन घूमते घूमते , ठाकुर साहब की पड़ी नजर, बस क्या था , बदली किस्मत, पिंड बना सरताज, पूजा जाने लगा हर दिन  पिंड बना महाराज ! आस पास जमींन  थी खाली   लिया ठाकुर अपनाय ! फूल चढ़ाये , मेवा  चढ़ाये  कहे तर्रक्की का राज  पिंड भी सोचे – "वाह रे भक्तों! कल तक देते थे गाली, अब तो मुझपे भी चढ़ती है, भक्ति की रंगी जाली! कुछ लोगो ने किया दुःसाहस  ठुकराया अंधविश्वास  बोला ,न उसमें कोई चमत्कार  न उसमे कोई जीवन  फिर क्यों चढ़ाये  फूल,  गाये  उसका  गुण-गान।  पूरा गावँ परेशान हैरान  पड़ी असमंजस भारी  भक्ति नहीं ये मजबूरी है, सभी की पूजा बहुत जरुरी है  जो इसे ठुकराएगा  जिन्दा न बच पायेगा  गावँ में रहना हो शांतिमय  तो बोलो पिंड महाराज की जय! लेखक :- पवन कुमार