ठाकुर की कृपा!
गावँ के गलियारे में, एक पिंड पड़ा था जर्जर, सालों से उस पर कुत्ता मूतता नहीं किसी को फिकर , एक दिन घूमते घूमते , ठाकुर साहब की पड़ी नजर, बस क्या था , बदली किस्मत, पिंड बना सरताज, पूजा जाने लगा हर दिन पिंड बना महाराज ! आस पास जमींन थी खाली लिया ठाकुर अपनाय ! फूल चढ़ाये , मेवा चढ़ाये कहे तर्रक्की का राज पिंड भी सोचे – "वाह रे भक्तों! कल तक देते थे गाली, अब तो मुझपे भी चढ़ती है, भक्ति की रंगी जाली! कुछ लोगो ने किया दुःसाहस ठुकराया अंधविश्वास बोला ,न उसमें कोई चमत्कार न उसमे कोई जीवन फिर क्यों चढ़ाये फूल, गाये उसका गुण-गान। पूरा गावँ परेशान हैरान पड़ी असमंजस भारी भक्ति नहीं ये मजबूरी है, सभी की पूजा बहुत जरुरी है जो इसे ठुकराएगा जिन्दा न बच पायेगा गावँ में रहना हो शांतिमय तो बोलो पिंड महाराज की जय! लेखक :- पवन कुमार